Friday, 7 October 2011

KAGAZ KA PRATHAM SAMPADKEEYA

"कागज़!
     अभिव्यक्ति का वाहक,जो एक ओर अपने सीने पर इतिहास ढोए चलता है तो दूसरी ओर वर्तमान को संभाले रखता है और भविष्य के लिए पाथेय संजोकर चलता है.
     कागज़ न हिन्दू है न मुस्लिम,न इसाई है न सिख या न फिर और कुछ-कागज़ तो कागज़ है.लेकिन इसकी नियति ! एक ओर तो मूल्यवान वस्तुओं-सा सुरक्षित रखने हेतु प्राह्लादों में होता है तो एक ओर रद्दी की तोकरियन भी इसी के लिए बनी होती हैं.यह धर्म निरपेक्ष और समदर्शी भी है-आप चाहें आप लिख लीजिये आपका दुश्मन चाहे दुश्मन लिख ले.
     शक्ति के पर्व पर हम इसे मानते हैं की आज हमारी शक्ति कागज़ में ही निहित है-बैलेट हो,अखबार हो,शांति-समझौता हो,हिट-लिस्ट हो या फिर आणविक सूत्रों की नयी-नयी व्याख्या हो.
     विध्वंशक और रचनात्मक दोनों पक्षों को हमारे सामने रखनेवाला परिचय का मोहताज़ नहीं,बल्कि हम-आप का परिचय देता है हाँ-आपकी विवेचनात्मक,विवेकी और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का अपेक्षित है."कागज़" आपके समक्ष है,आप ही बताएँ इसे कैसे रचनात्मक बनायें और यह भी-यह रद्दी है या पठनीय !


सम्पादक."

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