"कागज़!
अभिव्यक्ति का वाहक,जो एक ओर अपने सीने पर इतिहास ढोए चलता है तो दूसरी ओर वर्तमान को संभाले रखता है और भविष्य के लिए पाथेय संजोकर चलता है.
कागज़ न हिन्दू है न मुस्लिम,न इसाई है न सिख या न फिर और कुछ-कागज़ तो कागज़ है.लेकिन इसकी नियति ! एक ओर तो मूल्यवान वस्तुओं-सा सुरक्षित रखने हेतु प्राह्लादों में होता है तो एक ओर रद्दी की तोकरियन भी इसी के लिए बनी होती हैं.यह धर्म निरपेक्ष और समदर्शी भी है-आप चाहें आप लिख लीजिये आपका दुश्मन चाहे दुश्मन लिख ले.
शक्ति के पर्व पर हम इसे मानते हैं की आज हमारी शक्ति कागज़ में ही निहित है-बैलेट हो,अखबार हो,शांति-समझौता हो,हिट-लिस्ट हो या फिर आणविक सूत्रों की नयी-नयी व्याख्या हो.
विध्वंशक और रचनात्मक दोनों पक्षों को हमारे सामने रखनेवाला परिचय का मोहताज़ नहीं,बल्कि हम-आप का परिचय देता है हाँ-आपकी विवेचनात्मक,विवेकी और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का अपेक्षित है."कागज़" आपके समक्ष है,आप ही बताएँ इसे कैसे रचनात्मक बनायें और यह भी-यह रद्दी है या पठनीय !
सम्पादक."
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