Saturday, 8 October 2011

LOG-JINSE MEIN MILA 6

६.युवा लोकप्रिय फिल्मी गायक-मनो
मेरे मित्र रामकी ने १९८७ अक्टूबर में विजया वाहिनी स्टूडियो में अपने हम उम्र सुन्दर,स्मार्ट और हसमुख व्यक्ति से मेरा परिचय कराते हुए कहा था यह मनो है बहुत सुन्दर गाते हैं मेरे दोस्त हैं और मनो को मेरा परिचय देते हुए बताया था की मैं बिहार का हूँ और बिहार में मिथिला पुरी का हूँ बहुत अच्छा हिंदी का विद्वान हूँ और अच्छा गीत लिखता हूँ.मैंने रामकी की बनाई धुन पर एक गीत लिखा था जिसके कारण रामकी बहुत प्रभावित था.मनो ने काफी अपनेपन के साथ मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया था और मैं उसके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुआ था.रामकी ने बताया की मनो ने पिछले वर्ष पहला हिट गीत कन्नड़ फिल्म के लिए गाया है और पार्श्व गायन के क्षेत्र में अभी अभी तेजी से उभरा है.रामकी भी कुछ धुन उस समय के प्रसिद्ध संगीत निर्देशक एल.वैद्यनाथन(हिंदी सीरियल मालगुडी डेज़ के संगीत निर्देशक) के साथ मिल कर बनाया था और फिल्म में जमने के लिए संघर्षरत था.बाद में दूरदर्शन पर नया वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य सहभागी के रूप में मनो को देख कर ख़ुशी हुई.उसने हिंदी फिल्मी गीत भी गाये हैं.


ईश्वर करुण,
चेन्नई.    

Friday, 7 October 2011

LOG-JINSE MEIN MILA 5

५.बीते ज़माने के तमिल फिल्म स्टार-टी.राजेन्दर
तब मैं चेन्नई में नया नया आया ही था.१९८७ का सितम्बर महिना था.मेरी पहली दोस्ती कन्नड़ भाषी हिंदी जानने वाले संगीतकार डी.रामकृष्णा से हुई.उनका तमिल फिल्म इन्डस्ट्री के कई नामी गिरामी लोगों से परिचय था.वह मुझे भैया कहता है आज भी मेरा मित्र है.एक शाम वह मुझे विजया फिल्म स्टूडियो ले गया.मेरे लिए फिल्म स्टूडियो के अन्दर जाना ही बड़ी बात थी.वहां उसने मेरा परिचय टी.राजेन्दर जी से कराया.कद के छोटे लेकिन कद्दावर अभिनेता टी.राजेन्दर उस समय चर्चित फिल्म स्टार थे.उन्होंने काफी गर्मजोशी से  हाथ मिलाया.किसी अभिनेता से मिलने का यह मेरा प्रथम अवसर था.मुझे बहुत अच्छा लगा.इसका श्रेय रामकी को जाता है.बाद में कन्नड़ फिल्म इन्डस्ट्री के बैंगलोर स्थानांतरित हो जाने के कारण डी.रामकृष्णा भी बैंगलोर चले गए बाद में मैसूर चले गए.टी.राजेन्दर के अभिनेता पुत्र सिलाम्बरसन के पोस्टर देखता हूँ तो उनके पिता से हुई मुलाकात आखों के आगे तैर जाती है.


ईश्वर करुण,
चेन्नई.

KAGAZ KA PRATHAM SAMPADKEEYA

"कागज़!
     अभिव्यक्ति का वाहक,जो एक ओर अपने सीने पर इतिहास ढोए चलता है तो दूसरी ओर वर्तमान को संभाले रखता है और भविष्य के लिए पाथेय संजोकर चलता है.
     कागज़ न हिन्दू है न मुस्लिम,न इसाई है न सिख या न फिर और कुछ-कागज़ तो कागज़ है.लेकिन इसकी नियति ! एक ओर तो मूल्यवान वस्तुओं-सा सुरक्षित रखने हेतु प्राह्लादों में होता है तो एक ओर रद्दी की तोकरियन भी इसी के लिए बनी होती हैं.यह धर्म निरपेक्ष और समदर्शी भी है-आप चाहें आप लिख लीजिये आपका दुश्मन चाहे दुश्मन लिख ले.
     शक्ति के पर्व पर हम इसे मानते हैं की आज हमारी शक्ति कागज़ में ही निहित है-बैलेट हो,अखबार हो,शांति-समझौता हो,हिट-लिस्ट हो या फिर आणविक सूत्रों की नयी-नयी व्याख्या हो.
     विध्वंशक और रचनात्मक दोनों पक्षों को हमारे सामने रखनेवाला परिचय का मोहताज़ नहीं,बल्कि हम-आप का परिचय देता है हाँ-आपकी विवेचनात्मक,विवेकी और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का अपेक्षित है."कागज़" आपके समक्ष है,आप ही बताएँ इसे कैसे रचनात्मक बनायें और यह भी-यह रद्दी है या पठनीय !


सम्पादक."

KAGAZ KA PRAVESHANK

कागज़ का प्रथम अंक अक्टूबर १९८९ में प्रकाशित किया गया था.इसका प्रवेशांक दुर्गा पूजा के अवसर पर बिहार एसोसिएशन राजेंद्र भवन में बड़ी संख्या में उपस्थित हिंदी जानने वालों के बीच किया गया था.इस अवसर पर तत्कालीन अध्यक्ष राजेंद्र चौधरी जी ने प्रथम प्रति प्राप्त की थी.चौधरी जी उस समय बिहार से प्रकाशित लोकप्रिय राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक INDIAN NATION के दक्षिण क्षेत्र के पदाधिकारी थे और बहुत अच्छे लेखक थे.उन्हीके नेतृत्व में बिहार एसोसिएशन परवान चढ़ा.वे जयप्रकाश नारायण और रामनाथ गोयनका के बहुत नज़दीक थे और चेन्नई में बिहार के बौद्धिक जगत के सच्चे प्रतिनिधि थे.कागज़ के संपादक ईश्वर करुण चेन्नई आए तो उनका पता ले के आए थे और उनसे उनके राजा अन्नामलाई पुरम आवास पर मिले थे.तब से चौधरी जी ने पुत्र समान  स्नेह दिया.उन्होंने बिहार एसोसिएशन का सदस्य बनाया और बिहार एसोसिएशन के दुर्गा पूजा की स्मारिका का सह संपादक भी बनाया.चौधरी जी के निधन के बाद बिहार एसोसिएशन की दुर्गा पूजा स्मारिका का संपादन ईश्वर करुण ने लम्बे समय तक किया.

Saturday, 1 October 2011

LOG-JINSE MEIN MILA 4

४.कलमों के धनी प्ले बेक सिंगर PBS यानी-पी.बी.श्रीनिवासन जी 
श्री पी बी श्रीनिवासन ने अपने नाम का संक्षिप्तीकरण करते हुए मुझसे पहली ही मुलाकात में कहा था-P B S यानि  PLAY BACK SINGER.सच है वे आज के दौर के वरिष्ठ गायक हैं जिन्होंने तमिल,तेलुगु,कन्नडा,मलयालम और हिंदी में एक से एक मधुर फिल्मी गीत लोकप्रिय अभिनेताओं के लिए गाया-M G R,शिवाजी गणेशन........ हिंदी में उनका गीत "सोजा राज कुमारी सो जा" काफी लोकप्रिय है.उनकी जेब में कमसेकम ८-१० कलम हमेशा रहते हैं.और डायरी तथा पुस्तकों का वजन भी वे सम्हाले फिरते हैं.बीते दिनों में उनका अड्डा वूद्लंद ड्रिवे हुआ करता था.उनका शगल है अच्छी गजलें लिखना और जिनको वो चाहते हैं उनके नाम के एक एक अक्षर से शुरू होने वाली पंक्तिओं की कविता लिखना देश में वे अपने ढंग के अलग कवि भी हैं.मेरा ये सौभाग्य है की उन्होंने मेरे नाम पर भी कविता लिखी.कई बार उनका फ़ोन भी आता है कभी किसी शब्द के सन्दर्भ में तो कभी हाल-चाल जानने के लिए.उन्होंने  ईश्वर करुण के लोकप्रिय गीत पुस्तक का लोकार्पण भी किया.मेरी हिंदी सेवा के लिए उनके द्वारा अंगवस्त्रम से सम्मानित होने का सौभाग्य भी मुझे मिला है.


ईश्वर करुण,
चेन्नई.      

LOG-JINSE MEIN MILA 3

 ३.टी वी पर हिंदी कविता के समर्थ प्रस्तोता-श्री सुभाष काबरा 
सुभाष काबरा जी को टी वी पर चर्चित कवि सम्मलेन "वाह-वाह" में देखा था. श्री अशोक चक्रधर जी के बाद वे वाह-वाह के संचालक बने थे.उनके छोटे छोटे हास्य पूर्ण वाक्य एक अलग खासियत लिए हुए थे और श्रोताओं को प्रभावित करने में सक्षम थे.अभी अभी पिछले दिनों उनसे मिलने और साथ साथ काव्य पाठ का अवसर मिला वे आगे बढ़ कर बड़ी आत्मीयता से मिले और लगभग १० बजे दिन से सायं ७ बजे तक अपनी छोटी छोटी हास्युक्तिओं और व्यंगयुक्तिओं से हम सब को हँसाते और प्रभावित करते रहे.बड़ी अंतरंगता से हमारी बातचीत होती रही.शाम को कवि सम्मलेन का बहुत अच्छा  संचालन तो किया ही शुद्ध हास्य और व्यंग की कविता सुना कर कवि सम्मलेन को सार्थक बनाया.मेरे गीतों के वे प्रशंसक हैं और उन्होंने मेरे गीतों को और मुझे भी बहुत सराहा.यह भेंट अविस्मरणीय है.उनकी पुस्तक "पढो समझो और मत मानो" से ही लिया गया उनका परिचय."५५ की उम्र तक ३०० रेडियो प्रोग्राम,३००० कवि सम्मलेन,धारावाहिकों के ३००० एपिसोड,४ टेली फिल्म्स,५ देशों की काव्य यात्राएं,४ कैसेट,एकाध किताब,यहाँ-वहां,जाने कहाँ कहाँ छपने का शगल,३०० शाल-श्रीफल,कुछ पुरस्कार सम्मान,२ बच्चे,१ बीबी,बहु,दामाद,अमूमन पाए जाने वाले सभी रिश्तेदार,और सबसे ऊपर माँ का आशीर्वाद,२-३ टेलीफ़ोन,१ फैक्स मशीन,बैंक के लोन पर घर और कार,और चलाना न जानते हुए भी एक कंप्यूटर.कंप्यूटर के पास वही पुराणी कलम और कोरे कागज़.रिटायरमेंट की कविता अभी नहीं लिखी.फिलहाल जेमिनी स्टूडियो में क्रिएटिव हेड.इतना परिचय काफी है ना ? कम लगे तो सीधे यहाँ संपर्क करें-kforkabra@gmail.com."
श्री सुभाष काबरा ने उपरोक्त पुस्तक २७.९.११ को मुझे भेंट देते हुए उस पुस्तक में,मेरे बारे में लिखा-"करुण भाई,ये किताब एक रोज़ कहीं खो जाएगी लेकिन आपके गीत युगों-युगों तक रहेंगे.आपकी विधा को सप्रणाम-ये प्रयास." 


ईश्वर करुण,
चेन्नई.